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महाभारत 8.5.27
संजय उवाच · saṃjaya uvāca
श्रिया कुलेन यशसा तपसा च श्रुतेन चत्वामद्य सन्तो मन्यन्ते ययातिमिव नाहुषम्
śriyā kulena yaśasā tapasā ca śrutena catvāmadya santo manyante yayātimiva nāhuṣam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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