महाभारत 8.5.55छिन्नपक्षतया तस्य गमनं नोपपद्यतेतथाहमपि संप्राप्तो लूनपक्ष इव द्विजःchinnapakṣatayā tasya gamanaṃ nopapadyatetathāhamapi saṃprāpto lūnapakṣa iva dvijaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें