महाभारत 8.5.83
न हि ज्यां स्पृशमानस्य तलत्रे चापि गृह्णतःपुमानाधिरथेः कश्चित्प्रमुखे स्थातुमर्हति
na hi jyāṃ spṛśamānasya talatre cāpi gṛhṇataḥpumānādhiratheḥ kaścitpramukhe sthātumarhati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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