महाभारत 8.50.65
वीरं मन्यत आत्मानं येन पापः सुयोधनःतमद्य मूलं पापानां जय सौतिं धनंजय
vīraṃ manyata ātmānaṃ yena pāpaḥ suyodhanaḥtamadya mūlaṃ pāpānāṃ jaya sautiṃ dhanaṃjaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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