महाभारत 8.51.39
जयद्रथस्य समरे कृत्वा रक्षां महारथःअन्तकप्रतिमश्चोग्रां रात्रिं युद्ध्वादहत्प्रजाः
jayadrathasya samare kṛtvā rakṣāṃ mahārathaḥantakapratimaścogrāṃ rātriṃ yuddhvādahatprajāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें