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महाभारत 8.51.55
यदि वा द्विपदां श्रेष्ठ द्रोणं मानयतो गुरुम्अश्वत्थाम्नि कृपा तेऽस्ति कृपे चाचार्यगौरवात्
yadi vā dvipadāṃ śreṣṭha droṇaṃ mānayato gurumaśvatthāmni kṛpā te'sti kṛpe cācāryagauravāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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