महाभारत 8.51.74
अपयानकृतोत्साहो निराशश्चापि जीवितेतस्थौ सुविह्वलः संख्ये प्रहारजनितश्रमः
apayānakṛtotsāho nirāśaścāpi jīvitetasthau suvihvalaḥ saṃkhye prahārajanitaśramaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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