महाभारत 8.52.26
न जाने च कथं प्रीतिः शैनेयस्याद्य माधवभविष्यति हते कर्णे मयि चापि जयाधिके
na jāne ca kathaṃ prītiḥ śaineyasyādya mādhavabhaviṣyati hate karṇe mayi cāpi jayādhike
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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