महाभारत 8.6.7
पर्यङ्केषु परार्ध्येषु स्पर्ध्यास्तरणवत्सु चवरासनेषूपविष्टाः सुखशय्यास्विवामराः
paryaṅkeṣu parārdhyeṣu spardhyāstaraṇavatsu cavarāsaneṣūpaviṣṭāḥ sukhaśayyāsvivāmarāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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