महाभारत 8.63.69सुकिङ्किणीकाभरणा कालपाशोपमायसीअभ्यद्रवत्सुसंक्रुद्धा नागकक्ष्या महाकपिम्sukiṅkiṇīkābharaṇā kālapāśopamāyasīabhyadravatsusaṃkruddhā nāgakakṣyā mahākapimइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें