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महाभारत 8.66.22
स एवमुक्तो मधुसूदनेन; गाण्डीवधन्वा रिपुषूग्रधन्वाउवाच को न्वेष ममाद्य नागः; स्वयं य आगाद्गरुडस्य वक्त्रम्
sa evamukto madhusūdanena; gāṇḍīvadhanvā ripuṣūgradhanvāuvāca ko nveṣa mamādya nāgaḥ; svayaṃ ya āgādgaruḍasya vaktram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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