महाभारत 9.1.48
गच्छन्तु योषितः सर्वा गान्धारी च यशस्विनीतथेमे सुहृदः सर्वे भ्रश्यते मे मनो भृशम्
gacchantu yoṣitaḥ sarvā gāndhārī ca yaśasvinītatheme suhṛdaḥ sarve bhraśyate me mano bhṛśam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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