महाभारत 9.1.52
प्राञ्जलिर्निःश्वसन्तं च तं नरेन्द्रं मुहुर्मुहुःसमाश्वासयत क्षत्ता वचसा मधुरेण च
prāñjalirniḥśvasantaṃ ca taṃ narendraṃ muhurmuhuḥsamāśvāsayata kṣattā vacasā madhureṇa ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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