महाभारत 9.1.5
हा कर्ण हा कर्ण इति शोचमानः पुनः पुनःकृच्छ्रात्स्वशिबिरं प्रायाद्धतशेषैर्नृपैः सह
hā karṇa hā karṇa iti śocamānaḥ punaḥ punaḥkṛcchrātsvaśibiraṃ prāyāddhataśeṣairnṛpaiḥ saha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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