महाभारत 9.13.10
ततोऽर्जुनो महाराज शरैः संनतपर्वभिःअवाकिरत्तां पृतनां मेघो वृष्ट्या यथाचलम्
tato'rjuno mahārāja śaraiḥ saṃnataparvabhiḥavākirattāṃ pṛtanāṃ megho vṛṣṭyā yathācalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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