महाभारत 9.15.54
ततस्तौ तु सुसंरब्धौ प्रध्माप्य सलिलोद्भवौसमाहूय तदान्योन्यं भर्त्सयन्तौ समीयतुः
tatastau tu susaṃrabdhau pradhmāpya salilodbhavausamāhūya tadānyonyaṃ bhartsayantau samīyatuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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