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महाभारत 9.16.51
प्रसार्य बाहू स रथाद्गतो गां; संछिन्नवर्मा कुरुनन्दनेनमहेन्द्रवाहप्रतिमो महात्मा; वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य
prasārya bāhū sa rathādgato gāṃ; saṃchinnavarmā kurunandanenamahendravāhapratimo mahātmā; vajrāhataṃ śṛṅgamivācalasya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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