महाभारत 9.16.73
तन्निकृत्तं धनुः श्रेष्ठमपास्य शिनिपुंगवःअन्यदादत्त वेगेन वेगवत्तरमायुधम्
tannikṛttaṃ dhanuḥ śreṣṭhamapāsya śinipuṃgavaḥanyadādatta vegena vegavattaramāyudham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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