महाभारत 9.18.27
कोऽन्यः शक्तो रणे जेतुमृते पार्थं युधिष्ठिरम्यस्य नाथो हृषीकेशः सदा धर्मयशोनिधिः
ko'nyaḥ śakto raṇe jetumṛte pārthaṃ yudhiṣṭhiramyasya nātho hṛṣīkeśaḥ sadā dharmayaśonidhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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