महाभारत 9.23.55
असज्जन्तस्तनुत्रेषु शरौघाः प्रापतन्भुविइन्द्राशनिसमस्पर्शा गाण्डीवप्रेषिताः शराः
asajjantastanutreṣu śaraughāḥ prāpatanbhuviindrāśanisamasparśā gāṇḍīvapreṣitāḥ śarāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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