महाभारत 9.23.57
आसीत्सर्वमवच्छन्नं गाण्डीवप्रेषितैः शरैःन प्राज्ञायन्त समरे दिशो वा प्रदिशोऽपि वा
āsītsarvamavacchannaṃ gāṇḍīvapreṣitaiḥ śaraiḥna prājñāyanta samare diśo vā pradiśo'pi vā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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