महाभारत 9.27.36
असिं दृष्ट्वा द्विधा छिन्नं प्रगृह्य महतीं गदाम्प्राहिणोत्सहदेवाय सा मोघा न्यपतद्भुवि
asiṃ dṛṣṭvā dvidhā chinnaṃ pragṛhya mahatīṃ gadāmprāhiṇotsahadevāya sā moghā nyapatadbhuvi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें