महाभारत 9.28.37
तमागम्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत्मुच्यतां संजयो जीवन्न हन्तव्यः कथंचन
tamāgamya mahāprājñaḥ kṛṣṇadvaipāyano'bravītmucyatāṃ saṃjayo jīvanna hantavyaḥ kathaṃcana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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