महाभारत 9.28.77
अहमेको विमुक्तस्तु भाग्ययोगाद्यदृच्छयाविद्रुतानि च सर्वाणि शिबिराणि समन्ततः
ahameko vimuktastu bhāgyayogādyadṛcchayāvidrutāni ca sarvāṇi śibirāṇi samantataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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