महाभारत 9.29.47
सिंहनादांस्ततश्चक्रुः क्ष्वेडांश्च भरतर्षभत्वरिताः क्षत्रिया राजञ्जग्मुर्द्वैपायनं ह्रदम्
siṃhanādāṃstataścakruḥ kṣveḍāṃśca bharatarṣabhatvaritāḥ kṣatriyā rājañjagmurdvaipāyanaṃ hradam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें