महाभारत 9.3.18
इन्द्रकार्मुकवज्राभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम्वानरं केतुमासाद्य संचचाल महाचमूः
indrakārmukavajrābhamindraketumivocchritamvānaraṃ ketumāsādya saṃcacāla mahācamūḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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