महाभारत 9.30.5
यद्यस्य समरे साह्यं कुरुते वज्रभृत्स्वयम्तथाप्येनं हतं युद्धे लोको द्रक्ष्यति माधव
yadyasya samare sāhyaṃ kurute vajrabhṛtsvayamtathāpyenaṃ hataṃ yuddhe loko drakṣyati mādhava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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