महाभारत 9.31.2
न हि संतर्जना तेन श्रुतपूर्वा कदाचनराजभावेन मान्यश्च सर्वलोकस्य सोऽभवत्
na hi saṃtarjanā tena śrutapūrvā kadācanarājabhāvena mānyaśca sarvalokasya so'bhavat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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