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महाभारत 9.31.54
संजय उवाच · saṃjaya uvāca
ततस्तव सुतो राजन्वर्म जग्राह काञ्चनम्विचित्रं च शिरस्त्राणं जाम्बूनदपरिष्कृतम्
tatastava suto rājanvarma jagrāha kāñcanamvicitraṃ ca śirastrāṇaṃ jāmbūnadapariṣkṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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