महाभारत 9.32.10
को नु सर्वान्विनिर्जित्य शत्रूनेकेन वैरिणापणित्वा चैकपाणेन रोचयेदेवमाहवम्
ko nu sarvānvinirjitya śatrūnekena vairiṇāpaṇitvā caikapāṇena rocayedevamāhavam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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