महाभारत 9.32.31
शल्यमद्योद्धरिष्यामि तव पाण्डव हृच्छयम्निहत्य गदया पापमद्य राजन्सुखी भव
śalyamadyoddhariṣyāmi tava pāṇḍava hṛcchayamnihatya gadayā pāpamadya rājansukhī bhava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें