महाभारत 9.32.3
किमिदं साहसं राजंस्त्वया व्याहृतमीदृशम्एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति
kimidaṃ sāhasaṃ rājaṃstvayā vyāhṛtamīdṛśamekameva nihatyājau bhava rājā kuruṣviti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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