महाभारत 9.34.53
गत्वा च पितरं प्राहुः प्रणम्य शिरसा तदासोमो वसति नास्मासु तस्मान्नः शरणं भव
gatvā ca pitaraṃ prāhuḥ praṇamya śirasā tadāsomo vasati nāsmāsu tasmānnaḥ śaraṇaṃ bhava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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