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महाभारत 9.37.39
ऋषिरुवाचकिं न पश्यसि मे ब्रह्मन्कराच्छाकरसं स्रुतम्यं दृष्ट्वा वै प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महता विभो
ṛṣiruvācakiṃ na paśyasi me brahmankarācchākarasaṃ srutamyaṃ dṛṣṭvā vai pranṛtto'haṃ harṣeṇa mahatā vibho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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