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महाभारत 9.37.40
तं प्रहस्याब्रवीद्देवो मुनिं रागेण मोहितम्अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीति प्रपश्य माम्
taṃ prahasyābravīddevo muniṃ rāgeṇa mohitamahaṃ na vismayaṃ vipra gacchāmīti prapaśya mām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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