महाभारत 9.37.43
ऋषिरुवाचनान्यं देवादहं मन्ये रुद्रात्परतरं महत्सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृक्
ṛṣiruvācanānyaṃ devādahaṃ manye rudrātparataraṃ mahatsurāsurasya jagato gatistvamasi śūladhṛk
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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