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महाभारत 9.38.32
सिन्धुद्वीपश्च राजर्षिर्देवापिश्च महातपाःब्राह्मण्यं लब्धवान्यत्र विश्वामित्रो महामुनिःमहातपस्वी भगवानुग्रतेजा महातपाः
sindhudvīpaśca rājarṣirdevāpiśca mahātapāḥbrāhmaṇyaṃ labdhavānyatra viśvāmitro mahāmuniḥmahātapasvī bhagavānugratejā mahātapāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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