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महाभारत 9.4.18
यदा च द्रौपदी कृष्णा मद्विनाशाय दुःखिताउग्रं तेपे तपः कृष्णा भर्तॄणामर्थसिद्धयेस्थण्डिले नित्यदा शेते यावद्वैरस्य यातना
yadā ca draupadī kṛṣṇā madvināśāya duḥkhitāugraṃ tepe tapaḥ kṛṣṇā bhartṝṇāmarthasiddhayesthaṇḍile nityadā śete yāvadvairasya yātanā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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