महाभारत 9.4.20
इति सर्वं समुन्नद्धं न निर्वाति कथंचनअभिमन्योर्विनाशेन स संधेयः कथं मया
iti sarvaṃ samunnaddhaṃ na nirvāti kathaṃcanaabhimanyorvināśena sa saṃdheyaḥ kathaṃ mayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें