महाभारत 9.45.78
ततो दैत्या विनिष्पेतुः शतशोऽथ सहस्रशःप्रदीप्तात्पर्वतश्रेष्ठाद्विचित्राभरणस्रजः
tato daityā viniṣpetuḥ śataśo'tha sahasraśaḥpradīptātparvataśreṣṭhādvicitrābharaṇasrajaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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