महाभारत 9.49.29
लोकान्समुत्पतन्तं च शुभानेकान्तयाजिनाम्ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्तेभ्यश्चाप्युत्पपात ह
lokānsamutpatantaṃ ca śubhānekāntayājināmtato'gnihotriṇāṃ lokāṃstebhyaścāpyutpapāta ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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