महाभारत 9.49.41
त्रीँल्लोकानपरान्विप्रमुत्पतन्तं स्वतेजसापतिव्रतानां लोकांश्च व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत
trīm̐llokānaparānvipramutpatantaṃ svatejasāpativratānāṃ lokāṃśca vrajantaṃ so'nvapaśyata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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