महाभारत 9.49.45
जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसत महौजसम्एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे
jaigīṣavyaṃ na paśyāmi taṃ śaṃsata mahaujasametadicchāmyahaṃ śrotuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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