महाभारत 9.50.37न गन्तव्यमितः पुत्र तवाहारमहं सदादास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारतna gantavyamitaḥ putra tavāhāramahaṃ sadādāsyāmi matsyapravarānuṣyatāmiha bhārataइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें