महाभारत 9.50.49
षष्टिर्मुनिसहस्राणि शिष्यत्वं प्रतिपेदिरेसारस्वतस्य विप्रर्षेर्वेदस्वाध्यायकारणात्
ṣaṣṭirmunisahasrāṇi śiṣyatvaṃ pratipediresārasvatasya viprarṣervedasvādhyāyakāraṇāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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