महाभारत 9.52.7
अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं प्रभुःराजर्षिरप्यनिर्विण्णः कर्षत्येव वसुंधराम्
avahasya tataḥ śakro jagāma tridivaṃ prabhuḥrājarṣirapyanirviṇṇaḥ karṣatyeva vasuṃdharām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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