महाभारत 9.53.2
मधूकाम्रवनोपेतं प्लक्षन्यग्रोधसंकुलम्चिरिबिल्वयुतं पुण्यं पनसार्जुनसंकुलम्
madhūkāmravanopetaṃ plakṣanyagrodhasaṃkulamciribilvayutaṃ puṇyaṃ panasārjunasaṃkulam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें