महाभारत 9.55.5
अहो दुःखं महत्प्राप्तं पुत्रेण मम संजयएवमुक्त्वा स दुःखार्तो विरराम जनाधिपः
aho duḥkhaṃ mahatprāptaṃ putreṇa mama saṃjayaevamuktvā sa duḥkhārto virarāma janādhipaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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