महाभारत 9.56.20
एवं तौ विचरन्तौ तु न्यघ्नतां वै परस्परम्वञ्चयन्तौ पुनश्चैव चेरतुः कुरुसत्तमौ
evaṃ tau vicarantau tu nyaghnatāṃ vai parasparamvañcayantau punaścaiva ceratuḥ kurusattamau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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