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महाभारत 9.58.12
पुनश्च राज्ञः पतितस्य भूमौ; स तां गदां स्कन्धगतां निरीक्ष्यवामेन पादेन शिरः प्रमृद्य; दुर्योधनं नैकृतिकेत्यवोचत्
punaśca rājñaḥ patitasya bhūmau; sa tāṃ gadāṃ skandhagatāṃ nirīkṣyavāmena pādena śiraḥ pramṛdya; duryodhanaṃ naikṛtiketyavocat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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